गुरुवार, 16 जून 2011

मंहगाई, गरीबी व खाद्य सुरक्षा
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अभी यह बात हो ही रही थी कि गरीबी रेखा 28.3 प्रतिशत से बढ़ा कर तेंदुलकर समिति की सिफारिशों के अनुसार 41.8 पर तय हो जबकि सरकार द्वारा ही नियुक्त सक्सेना समिति ने 49 प्रतिशत की संस्तुति की है और योजना आयोग के अजुन सेनगुप्ता ने 77 प्रतिशत असंगठित मजदूर को 20 रुपए से कम पर गुजारा करने की बात उजागर की, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि शहर में 20 रु. प्रतिदिन व गांव में 15 रु. प्रतिदिन की प्रति व्यक्ति आय को गरीबी रेखा मान लेना चाहिए। क्या मोंटेक सिंह खुद 20 रु. प्रति दिन की आय पर जी कर दिखा सकते हैं?

सरकार द्वारा गरीबी रेखा पर एक सीमा तय कर देने से बहुत से गरीब इस श्रेणी को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। गांव-गांव की कहानी है कि पात्र गरीब गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की सूची से बाहर हैं तथा तमाम अपात्र लोग इसमें शामिल हैं। यदि मनरेगा की तरह यह छूट मिले कि कोई भी जरूरतमंद अपना कार्ड बनवा सकता है तभी यह समस्या हल हो पाएगी। इसको दूसरे तरीके से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लोक व्यापीकरण की मांग के रूप में भी उठाया जा रहा है।

अब सरकार ने नया शिगूफा छोड़ा है। वह कह रही है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनाज के बदले नकद देगी। उ. प्र. में हरदोई व लखीमपुर खीरी को प्रयोग के लिए चुना गया है। हाल ही में हरदोई में कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि गरीब व्यक्ति अनाज ही चाहता है। फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली की वजह से अनाज की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद से किसान को सम्मानजनक नहीं तो एक न्यूनतम मूल्य तो मिल ही जाता है। कृषि पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया है यह तो स्पष्ट है। 1950 व ‘60 में कृषि विकास दर हुआ करती थी 3.2 प्रतिशत जो अब 1.3 प्रतिशत है। कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा हुआ करता था 60 प्रतिशत जो अब घटकर मात्र 13 प्रतिशत रह गया है।

हाल ही में भू अधिग्रहण के इतने मामले सामने आए हैं जहां किसानों की जमीनें जबरदस्ती निजी व्यवसायिक हितों की पूर्ति के लिए ली जा रही हैं। महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों, जैसे जल, जंगल, जमीन व खनिज, जिस पर गरीब लोगों का जीवन व जीविका निर्भर है के लूट की खुली छूट पैसे वालों को मिली हुई है और हमारे लोकतंत्र में सरकार ताकतवर लोगों के साथ मिल कर गरीब का दमन करती नजर आती है।

सरकार ने जो आर्थिक नीतियां अपनाई हुई हैं उससे गरीब व अमीर का फर्क बढ़ता जा रहा है। नई आर्थिक नीतियों के लागू हाने के बाद से जबकि सेवा क्षेत्र में तनख्वाहें 15 गुना से भी ज्यादा बढ़ गई हैं तो दैनिक मजदूर की मजदूरी दोगुनी ही हुई है। सेवा क्षेत्र, जिसका प्रतिशत कुल आबादी का 3-5 होगा, के लोगों के वेतन बढ़ते ही बाजार में जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं और इसकी गाज गिरती है 70-80 प्रतिशत दैनिक मजदूरी करने वाले पर। यही कारण है कि आजादी के समय से प्रति व्यक्ति अनाज व दाल की खपत में भारी गिरावट आई है। यानी हमारी विकास दर भले ही अच्छी दिखाई देती हो किन्तु खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से हमारी अधोगति हुई है।
कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा उन लोगों की तानाशाही से है जो न तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से चुने गए हैं और न ही चुनाव जीत सकते है. उनके अनुसार ‘अतार्किक आशाएं एवं रवैया’ अब केंद्र सरकार की बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है. इससे पहले प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने से और संवैधानिक शक्तियों से अधिक प्राधिकार देने से लोकतंत्र खत्म हो जायेगा.

हालाँकि सरकार, जनता के प्रतिनिधियों के साथ, लोकपाल बिल का मसौदे तैयार कर रही है, पर यह स्पष्ट है कि सरकार इसके प्रति संजीदा नहीं है. कांग्रेस पार्टी जो सत्ता में है, उसके वरिष्ठ सदस्यों ने लोकपाल बिल मसौदा तैयार करने की समिति में जनता के सदस्यों के प्रति आक्रामक और कठोर रवैया अपनाया हुआ है. सरकार के इस रोष का क्या कारण है?

असल में सभी मुख्यधारा के राजनीतिक दल भ्रष्टाचार से पैदा हुए पैसे पर चलते हैं. चुनाव जीतने के लिये जिस प्रकार के भ्रष्ट तरीकों का इस्तेमाल होता है, उसके बिना यह राजनीतिक दल कैसे चुनावी राजनीति कर पाएंगे? बिना पार्टी की भ्रष्ट प्रणाली के मनीष तिवारी खुद ही चुनाव नहीं जीत पाएंगे. आखिर यह तो पता चले कि कांग्रेस पार्टी या किसी भी पार्टी के कितने सदस्यों ने पिछले लोकसभा चुनाव को, खर्च-सीमा रुपया २५ लाख से कम खर्चा करके, जीता है? आशाजनक प्रतियाशियों को चुनाव आयोग की इस खर्च-सीमा से अधिक पैसे देने के लिये कांग्रेस पार्टी जानी जाती है. जब बुनियाद में ही भ्रष्टाचार हो तो यह कैसे हो सकता है कि निर्वाचित सांसद इमानदारी से कार्य करेंगे?

बढ़ती महंगाई के लिए सरकार ही जिम्मेदार है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अनुसार शहर में रु. 20 प्रतिदिन व गांव में रु. 15 प्रतिदिन की प्रति व्यक्ति आय को गरीबी रेखा मान लेना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि गाँव में रु. १६ और शहर में रु. २१ प्रतिदिन कमाने वाले लोग गरीब नहीं हैं. क्या मोंटेक सिंह खुद रु. 21 प्रति दिन की आय पर जी कर दिखा सकते हैं? क्या यह सरकार का ‘अतार्किक आशाएं एवं रवैया’ नहीं है?

अन्ना हजारे के नेत्रित्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान ने आम लोगों से इसीलिए समर्थन पाया है क्योंकि आम लोग ही इस भ्रष्ट प्रणाली के शिकार हैं. इस समय आम लोग ही अपने चुने-हुए-राजनेताओं के बजाय अन्ना हजारे का समर्थन कर रहे हैं. इस सन्दर्भ में फिलहाल तो अन्ना हजारे ही अधिक सच्चे जन-प्रतिनिधि हुए जब कि वें शायद मनीष तिवारी की तरह चुनाव न जीत सकें.

एक समय ऐसा आएगा जब हमारे तथा-कथित राजनेताओं की जन-सेवा में पृष्ठभूमि पर सवाल उठेंगे. अन्ना हजारे या मनीष तिवारी - किसकी जन-सेवा में बेहतर पिछली उपलब्धियां हैं? इस दृष्टिकोण से भी मनीष तिवारी के मुकाबले अन्ना हजारे अधिक श्रेष्ठ जन-प्रतिनिधि हैं. नौसिखियों को, बिना जन-सेवा के अनुभव के, मात्र अपने सही जान-पहचान या पैसे के बल पर, राजनेता बनने देने के चलन को, बंद करना होगा. वर्तमान लोकसभा के आधे सांसद अत्यधिक अमीर हैं, और १६२ सांसदों पर अपराधी होने का आरोप लगा हुआ है, ऐसे में इसको कैसे भारत के नागरिकों का प्रतिनिधि माना जा सकता है जिनमें से अधिकाँश लोग गरीब हैं और शक्तिशाली लोगों द्वारा किये गए अपराधों का शिकार हैं. एक शक्तिशाली और प्रभावकारी लोकपाल कानून के आ जाने से ऐसे राजनेताओं की कौम के अस्तित्व को ही खतरा है जो अन्ना हजारे के अभियान के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. यही डर उनके आक्रामक रवैये के रूप में व्यक्त हो रहा है. आक्रामकता एक डरपोक और भ्रष्ट व्यक्ति का हथियार है !
ताजो तख्त नहीं,
मगर दिल में शहंशाह की हिम्मत है.
हर कदम पर जूझते हुए आगे बढा हूँ,
हर चीज़ को पाने के लिए लड़ा हूँ,
आज जो कुछ भी हूँ,
खुद की बदौलत हूँ,
खुद के हौंसले से,
मेरे लिये मुश्किल का अर्थ है मुकाबला.
डर!
ये किस चिडिया का नाम है????
मेरे सामने तो सिर्फ मंजिलें हैं,
सिर्फ मुकाम हैं.
देखना,
ज़िन्दगी की शाम मे मेरे चेहरे पे झुर्रियां होंगी,
और
आँखों मे
नई सुबह की रोशनी,
और मैं कहूँगा-
सिर्फ जिंदा नहीं रहा मैं,
ज़िन्दगी जी है मैंने
अपनी शर्तों पर